Thursday, 15 November 2012

स्वर्णाकर्षण भैरव साधना




अभी अभी दिवाली संपन्न हुयी है और आशा करती हु की आप सभी की दिवाली सदगुरु जी  की कृपा से खुशहाली ही लायेगी , यह तो प्रेम है माँ भागवातीजी का की आपके जीवन में ख़ुशी ओ की कोई कमी ना हो।आज की यह प्रयोग बहुत ही प्यारी है,इस प्रयोग को स्वर्नाकर्षण भैरव कहेते है।ज्यो धन प्राप्ति की लिए अचूक है और प्रभावी भी। सिर्फ अगर आप इस प्रयोग की विधि सही समय पे करेगे तो निच्छ्य  ही आपकी सारी आर्थिक समस्याये समाप्त हो जायेगी . मै पूर्ण विश्वास के साथ कहेती हु की एक बार यह प्रयोग आप संपन्न कर लीजिये और साडी परेशानिया भूला दीजिये। इस रविवार की रात्रि में यह प्रयोग करनी ही है,क्युकी इस दिन सौभाग्य पंचमी है और दूसरी बात कार्तिक माह में यह साधना कुछ ज्यादा ही सफलता देती है।
यह साधना दक्षिण दिशा की और मुख करके करनी है,माला आप रुद्राक्ष या काली हकिक की ले सकते है,आसन पीले रंग की हो,इस मन्त्र की 11 माला मंत्र जाप रात्रि में 10 बजे के बाद करनी है।सबसे पाहिले गुरुपूजन कीजिये और गुरुमंत्र की 5 माला जाप आवश्यक है। मन्त्र जाप समाप्ति के बाद उसी रात्रि में माला किसी निर्जन स्थान में जमींन में गाड दीजिये, और बिना पीछे मुड़े घर पे वापस आजायिये।ऐसा करने पर निच्यय ही साधक के घर से परेशानिया दूर भाग जाती है और सम्पन्नता आने लगती है .



आवाहन :-


आगच्छेह महादेव। सर्वसम्पत्प्रदायक।।
यावाज्जपम समाप्येत तावत त्वम् सन्निधौ भव।।
श्री   स्वर्णाकर्षण  भैरवाय नम: आवाहयामि आवाहयामि नम:





मन्त्र :-



     ॐ ऐम क्लीं क्लीं क्लूम ह्रां ह्रीं हं स: वं आपदुद्धारनाय अजामलबद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण  भैरवाय मम दारिद्र्य विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम:।। 





साधना

जय निखिलेश्वर ................................................................................................

Saturday, 10 November 2012

श्री महालक्ष्मी पूजन व दीपावली का महापर्व

 

श्री महालक्ष्मी पूजन व दीपावली का महापर्व कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की अमावस्या में प्रदोष काल, स्थिर लग्न समय में मनाया जाता है. धन की देवी श्री महा लक्ष्मी जी का आशिर्वाद पाने के लिये इस दिन लक्ष्मी पूजन करना विशेष रुप से शुभ रहता है.

वर्ष 2012 में दिपावली, 13 नवम्बर, मंगलवार के दिन की रहेगी. इस दिन चित्रा नक्षत्र, परन्तु प्रदोषकाल के बाद स्वाती नक्षत्र का काल रहेगा, इस दिन प्रीति योग तथा चन्दमा तुला राशि में संचार करेगा. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिया मुहूर्त विशेष महत्व रखते है. बुधवार की दिपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रुप से शुभ मानी जाती है.

 

1. प्रदोष काल मुहूर्त कब
1. When comes Pradosh Kaal Muhurta

13 नवम्बर 2012, मंगलवार के दिन दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में सूर्यास्त 17:26 पर होगा. इस अवधि से लेकर 02 घण्टे 24 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा. इसे प्रदोष काल का समय कहा जाता है. प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है. प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उतम रहता है. इस दिन प्रदोष काल व स्थिर लग्न दोनों 17:33 से लेकर 19:28 का समय रहेगा. इसके बाद 19:02 से 20:36 तक शुभ चौघडिया भी रहने से मुहुर्त की शुभता में वृ्द्धि हो रही है.

प्रदोष काल का प्रयोग कैसे करें
How to Perform the Pradosh Kaal Activity

प्रदोष काल में मंदिर में दीपदान, रंगोली और पूजा से जुडी अन्य तैयारी इस समय पर कर लेनी चाहिए तथा मिठाई वितरण का कार्य भी इसी समय पर संपन्न करना शुभ माना जाता है.

इसके अतिरिक्त द्वार पर स्वास्तिक और शुभ लाभ लिखने का कार्य इस मुहूर्त समय पर किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त इस समय पर अपने मित्रों व परिवार के बडे सदस्यों को उपहार देकर आशिर्वाद लेना व्यक्ति के जीवन की शुभता में वृ्द्धि करता है. मुहूर्त समय में धर्मस्थलो पर दानादि करना कल्याणकारी होगा.

2. निशिथ काल
2. Nishith Kaal

13 नवम्बर, मंगलवार के दिन निशिथ काल लगभग 20:10 से 22: 52 तक रहेगा. स्थानीय प्रदेश के अनुसार इस समय में कुछ मिनट का अन्तर हो सकता है. निशिथ काल में लाभ की चौघडिया भी रहेगी, ऎसे में व्यापारियों वर्ग के लिये लक्ष्मी पूजन के लिये इस समय की विशेष शुभता रहेगी.

दिपावली पूजन में निशिथ काल का प्रयोग कैसे करें
How to perform TXT Nishith Kaal in Deepavali Puja

धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.

3. महानिशीथ काल
3. Maha Nishith Kaal

धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.

13 नवम्बर, मंगलवार 2012 के रात्रि में 22:52 से लेकर अगले दिन प्राप्त: 25:34 मिनट तक महानिशीथ काल रहेगा. महानिशीथ काल में कर्क लग्न भी हों, तो विशेष शुभ माना जाता है. महानिशीथ काल व कर्क लग्न एक साथ होने के कारण यह समय अधिक शुभ हो गया है. जो जन शास्त्रों के अनुसार दिपावली पूजन करना चाहते हो, उन्हें इस समयावधि को पूजा के लिये प्रयोग करना चाहिए.

महानिशीथ काल का दिपावली पूजन में प्रयोग कैसे करें
How to Include Maha Nishith Kaal in Deepavali Puja

महानिशीथकाल में मुख्यतः तांत्रिक कार्य, ज्योतिषविद, वेद् आरम्भ, कर्मकाण्ड, अघोरी,यंत्र-मंत्र-तंत्र कार्य व विभिन्न शक्तियों का पूजन करते हैं एवं शक्तियों का आवाहन करना शुभ रहता है. अवधि में दीपावली पूजन के पश्चात गृह में एक चौमुखा दीपक रात भर जलता रहना चाहिए. यह दीपक लक्ष्मी एवं सौभाग्य में वृध्दि का प्रतीक माना जाता है
.
लक्ष्मी पूजा विधि
ओम अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोस्ति वा।
य: स्मेरत पुण्डरीकांक्ष स बाह्यभ्यन्तर: शुचि: ॥
चौकी के दायीं ओर घी का दीपक प्रज्जवलित करें। इसके पश्चात दाहिने हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्न मंत्रों से स्वस्तिवाचन करें -
ओम स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धाश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमि:स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु॥
पय: पृथिव्यांपय ओषधीयु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धा:। पयस्वती: प्रदिश: सन्तु मह्यम। विष्णो रामटमसि विष्णो: श्नप्त्रेस्थो विष्णो: स्यूरिस विष्णोधुरर्वासि:। वैष्णवमसि विष्णवे त्वा॥ अग्निर्देवताव्वातोदेवतासूय्र्योदेवता चन्द्रमा देवताव्वसवो देवता रुद्रोदेवता बृहस्पति: देवतेन्द्रोदेवताव्वरुणादेवता:॥ ओम शांति: शांति: सुशांतिभर्वतु। सर्वोरिष्ठ-शांतिर्भवतु॥

विभिन्न देवता‌ओं के स्मरण के पश्चात निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें-

विनायकम गुरुं भानुं ब्रहाविष्णुमहेश्वरान।
सरस्वतीय प्रणाम्यादौ सर्वकार्यार्थ सिद्धर्य॥

हाथ में लि‌ए हु‌ए अक्षत और पुष्प को चौकी पर समर्पित कर दें।
एक सुपारी लेकर उस पर मौली लपेटकर चौकी पर थोड़े से चावल रखकर सुपारी को उस पर रख दें। तदुपरांत भगवान गणेश का आह्वान करें-
आहृवान के पश्चात निम्नलिखित मंत्र की सहायता से गणेशजी की प्रतिष्ठा करें और उन्हें आसन दें-

अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा: क्षरन्तु च।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥
गजाननं सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम ॥
प्रतिष्ठापूर्वककम आसनार्थे अक्षतान समपर्यामि गजाननाभ्यां नम:।

पुन: अक्षत लेकर गणेशजी के दाहिनी ओर माता अम्बिका का आवाहन करें
ओम अम्बे अम्बिकेम्बालिके न मां नयति कश्चन।
ससस्त्यश्वक: सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम ।
हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शंकरप्रियाम।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम॥
ओम भूभुर्व: स्व: गौर्य नम:, गौरीमावाहयमि, स्थापयामि, पूजयामि च ।

अक्षत चौकी पर छोड़ दें। अब पुन: अक्षत लेकर माता अम्बिका की प्रतिष्ठा करें-

अस्यै देवत्वमचौर्य मामहेति च कश्चन॥
आम्बिके सुप्रतिष्ठिते भवेताम।
प्रतिष्ठापूर्वकम आसनाथे अक्षतान समर्पयामि गणेशम्बिका नम: ।
ऐसा कहते हु‌ए आसन के समक्ष समर्पित करें।
महाल्क्ष्मी पूजन

उक्त समस्त प्रक्रिया के पश्चात प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करना चाहि‌ए। पूजन से पूर्व नवीन चित्र और श्रीयंत्र तथा द्रव्यलक्ष्मी स्वर्ण अथवा चांदी के सिक्के आदि की निम्नलिखित मंत्र से अक्षत छोड़कर प्रतिष्ठा कर लेनी चाहि‌ए।
अस्यै प्राण: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा: क्षरन्तु च ।

अस्यै देवत्मर्चायै मामहेति च कश्चन॥

ध्यान: तदुपरान्त हाथ में लाल कमल पुष्प लेकर निम्न मंत्र देवी लक्ष्मी का ध्यान करें।
आवाहन: हाथ में पुष्प लेकर देवी का आवाहन करे-

सर्वलोकस्य जननीं सर्वसौख्यप्रदासिनौम।
सर्वदेवमदयीमीशां देवीवाहयाम्हम॥

अब पुष्प समर्पित करें।

तप्मका‌ऋनर्वाभं मुक्तामणिविराजितम।
अमलं कमलं दिव्योमासन प्रतिगृहृताम॥

आसन के लि‌ए कमल पुष्प अर्पित करें-

गड्डनदितीर्थसम्भूतं गन्धपुष्पादिभिर्युतम।
पाद्यं ददाम्यी देवि गृहाणाशु नमोस्तुति ते॥

अघ्र्य: निम्न मंत्र से देवी को अघ्र्य दें अष्टगंध से मिश्रित जल से-

अष्टगन्धसमायुक्तं स्वर्णपात्रप्रपूरितम।
अघ्र्यं गृहाण महतं महालक्ष्मी नमोस्तुते॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। अघ्य समर्पयामि॥

स्नान: निम्न मंत्र से देवी को स्नान करा‌एं-

मन्दाकिन्या: समानीतैर्हेमाम्भोरुहासितै:।
स्नानं कुरूष्व देवेशि सलिलैश्च सुगन्धिभि:॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। स्नानं समर्पयामि॥
पचांमृतस्नान: निम्न मंत्र से देवी को पंचामृत घी, शहद, दुग्ध, शर्करा, दही स्नान करा‌ए:
पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम।
पत्रामृतं मयानीतं स्नानार्थ प्रतिगुहृताम॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। पंचामृत स्नानं समर्पयामि॥
शुद्धोदक स्नान: निम्न मंत्र से देवी को शुद्धोदक स्नान करा‌एं:
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम।
तदिदं कल्पित तुभ्यं स्नानार्थ प्रतिगृहृताम॥
ओम महालक्ष्त्यै नम:। शुद्धोदक स्नानं समर्पयातिम॥

वस्त्र: निम्न मंत्र से देवी को वस्त्र अर्पित करें:

दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमं त्वतिमनोहरम।
दीयमानं मया देवि गृहाण जगदम्बिके॥
ओम महालक्ष्मै नम:। वस्त्रं समर्पयामि॥

आभूषण: निम्न मंत्र से देवी को आभूषण अर्पित करें:
रत्नकड्कणवैदूर्यमुक्ताहारादिकदत्तानि च।
सुप्रसन्नेन मनसा दत्ताति स्वीकुरुष्व भो:॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। आभूषणें समर्पयामि॥

गंध: निम्न मंत्र से देवी को गंध रोली-चंदन अर्पित करें:
श्रीखण्डं चंदन दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरम।
विलेपनं सुरक्षेष्ठ चदंन प्रमितगृहृताम॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। गन्धं समर्पयामि॥

सिंदूर: निम्न मंत्र से देवी को सिंदूर अर्पित करें:
सिन्दूरं रक्तवर्ण व सिन्दूरतिलप्रिये।
भक्त्या दत्तं मया देवि सिन्दूरं प्रतिगृहृताम॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। सिन्दूरं समर्पयामि॥

कुमकुम: निम्न मंत्र से देवी को कुमकुम अर्पित करें:
तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्ययाणि विविधानि च।
मया दत्तानि लेपाथ गृहाण परमेश्वरि॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। कुंकुमं समर्पयामि॥

अक्षत: निम्न मंत्र से देवी को अक्षत चावल अर्पित करे:
अक्षताश्च सुरक्षेष्ठे कुड्कमाक्ता: सुशोभिता:।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। अक्षतम समर्पयामि॥

अक्षत के स्थान पर अपनी परम्परा के अनुरूप हल्दी की गांठ या गुड़ भी अर्पित किया जाता है।
पुष्प एवं पुष्पमाला: निम्न मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को पुष्प एवं पुष्पमाला अर्पित करे-

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मयानीतानि पुष्पाणि पूजाथ प्रतिगृहृताम।
ओम महालक्ष्म्यै नम:। पुष्पं पुष्पमालाम च समर्पयामि॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। धूपमाप्रापघामि॥
दीप: निम्न मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को दीप दिखा‌एं:

साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहृना योजित मया।
दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्यतिमिरापहम॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। दीपम दर्शयामि॥

नैवेद्य: किसी कटोरी में पान के पत्ते के ऊपर नैवेद्य प्रसाद रखें तथा उस पर लौंग का जोड़ा अथवा इलायची रखें। तदुपरांत निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को उक्त समस्त सामग्री अर्पित करें-

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृहृाताम॥
उत्तरापानाथ हस्तप्रक्षालनाथ मुख्यप्रक्षलानार्थ च जलं समर्पयामि।

ऐसा कहते हु‌ए जल अर्पित करें।
ऋतुफल और दक्षिणा: अग्रलिखित मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को ऋतुफल और दक्षिणा अर्पित करें:

इदं फलं मया देवि स्थापित पुरतस्तव:।
तेन से सफलावप्तिर्भवेज्जनमनि जन्मनि॥
हिरणगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसों:।
अनन्तपुण्यफलमत: शांतिं प्रयच्छ मे॥
ओम महालक्ष्म्यै नम:। ऋतु फलं दक्षिणाम च समर्पयामि:॥


Lakshmi Mantra(धन लाभ व समृद्धि हेतु महालक्ष्मी मंत्र)


निम्न लिखित मंत्र का 72 दिनों में सवा लाख जप करें एवं इसका सवा हजार हवन करें । इस क्रिया के दौरान धूप दीपक नैवेद्य का उपयोग करें ।

ll ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ ll

 

आरती, पुष्पाज्जलि और प्रदक्षिणा
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए आरती, पुष्पाज्जलि और प्रदक्षिणा करें:

कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं त प्रदीपितम।
आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोभ्दवानि च।
पुष्पाज्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वरि॥
यानि काानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे।
ओम महालक्ष्म्यै नम:। प्रार्थनापूर्वक नमस्कारान समर्पयामि॥

समर्पण 

निम्नलिखित का उच्चारण करते हु‌ए महालक्ष्मी के समक्ष पूजन कर्म को समर्पित करें और इस निमित्त जल अर्पित करें-
कृतेनानने पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम न मम॥
उक्त प्रक्रिया के पश्चात देवी के समक्ष दण्डवत प्रणाम करें तथा अनजाने में हु‌ई त्रुटियों के लि‌ए क्षमा मांगते हु‌ए, देवी से सुख-सम़ृद्धि , आरोग्य तथा वैभव की कामना करें। 


Lakshmi Mantra(अक्षय धन की प्राप्ति हेतु)

 निम्न लिखित मंत्र की दीपावली के दिन 21 माला करें एवं दो माला हवन करें । एक ब्राह्मण को दूसरे दिन भोजन कराएं । इसके बाद नित्य एक माला पढ़ते रहें ।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ।

 

 

Lakshmi Mantra(व्यवसाय से अधिक लाभ हेतु)

 यदि रोज प्रातः इस मंत्र का एक माला जप करने के बाद अपने कार्यस्थल पर जाएं तो अद्भुत लाभ होगा ।

 

ॐ ह्री श्रीं क्रीं श्रीं क्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मी मम गृहे धनं पूरय पूरय चिंतायै दूरय दूरय स्वाहा ।

 Note:-samay na hone ki wajese maine sirf mantra yaha diyi huyi hai but baki poojan vidhi google se search kaerke yaha pe coppy-paste ki hai...........

 aap in mantro ki jaap sfatik and kamalgatte ki malase kar sakte hai.

 

 

..........................HAPPY DIWALI TO ALL...........................

 

jay nikhileshwar..................................


Saturday, 3 November 2012

शाबर मंत्रो से कीजिये हनुमानजी को प्रसन्न




सर्वमनोकामनापूर्ति हेतु प्रयोग-



इस माह कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (12 नवम्बर 2012) को हनुमान जयंती है..............
यह साधना हनुमान जयंती से प्रारम्भ करते हुये 10 दिन तक नीत्य हनुमान जी की पूजा-उपासना करते हुये सम्पन्न करनी है।इस साधना मे लाल मूंगा या रुद्राक्ष की माला प्रयोग मे जाप की लिये आवश्यक है , वस्त्र लाल हो तो अच्छी बात है नहीं तो आप ज्यो वस्त्र या आसन आपके पास है वही प्रयोग मे लीजिये। साधना काल मे चमेली के तेल की दीपक लगानी है , गुड और भुने हुये चने की भोग लगानी है , निम्न मंत्र की नित्य ११ मालाये जाप करनी है ॰
इस प्रयोग से साधक की सभी मनोकामनाये पूर्ण होती ही है ,यह मंत्र सर्वमनोकामनापूर्ति की लिये अचूक एवं प्रामाणिक मंत्र है................................

मंत्र

॥ ॐ नमो हनुमते भय भज्जनाय सुखं कुरु कुरु स्वाहा ॥

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कृपा प्राप्ति हेतु शाबर मंत्र


हनुमान जयंती की रात्री मे रामदरबार की तस्वीर स्थापित कीजिये और तस्वीर के समक्ष बैठकर पहिले उनकी पूजन कीजिये और नैवेद्य अर्पित कीजिये । तत्पश्चात निम्न मंत्र की २१ माला जाप रुद्राक्ष की मालासे २१ रात्रियों तक निरन्तर जारी रखे । इस प्रयोग से हनुमान जी की विशेष कृपा मिलती है और सभी प्रकार की समस्याये समाप्त हो जाती है।

मंत्र

 मा मुनगर बनर-कमर गासा नासे स्वाहा

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साक्षात दर्शन साधना

इस साधना से न केवल हनुमानजी की कृपा साथ मे दर्शन की प्राप्ति भी होती है। इस साधना की काल मे कुछ समस्याये भी साधक के सामने आती है, कई बार एकाग्रता नहीं बन पाती है तो कभी-कभी साधना भंग करने की लीये विभिन्न परिस्थितिया बन जाती है। इस साधना मे स्वयं की रक्षा हेतु सदगुरुजी से प्रार्थना तो करनी ही पड़ेगी क्यूकी यह येसी विचित्र साधना है समे बहोत सारी बाधाये,भूत,पिशाच आते जाते रहेती है चाहे यह हनुमानजी की साधना होकर भी ,यही साधना मे आश्चर्य की बात है
साधना विधि आसन लाल,माला रुद्राक्ष की,सामने रामदरबार जी की तस्वीर स्थापित करते हुये पंचोपचार पूजन या फिर मानसिक पूजन कीजिये। यह साधना हनुमान जयंती से प्रारम्भ करनी है,साधना की समय रात्रिकालिन होनी चाहिये,यह साधना ४१ दिन की है जिसमे ५१ माला मंत्र जाप रोज करनी है। सातवे दिन से ही आपको साधना की प्रभाव दिखने लग जाती है,साधना काल की दौरान ही साधक को हनुमान जी की सानिध्य प्राप्ति होनी की शुरवात हो जाती है,आज तक यह साधना कभी भी विफल नहीं हुयी है,हनुमानजी किसी भी रूप मे किसी भी अवस्था मे आकर साधक को उसकी इच्छा पूछते है और साधक ज्यो भी इच्छा कहेते है , वे उसकी पूर्ति शीघ्रता से करते ही है , साधना काल की दौरान अनुष्ठान मे सभी हनुमान साधना की नियम अति आवश्यक है॰

मंत्र-

॥ हे हनुमान की सूरत ! हाजिर हो ब-हक रामचंद्र जी महाराज ॥

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इन तीन साधना मे से अगर जीवन की व्यस्तता की कारण आप कोई भी साधना नहीं कर पाये तो इस दिन साधना प्रारम्भ करने की संकल्प ले लीजिये और आपकी समय की अनुसार साधना प्रारम्भ कर दीजिये ।
इस दिन से आप लगातार ५४ दिन तक बजरंग बाण की एक और श्री राम स्तुति की एक पाठ तो कम-से-कम नीत्य कीजिये आपको कई लाभ की प्राप्तिया आपकी जीवन मे देखने मिलेगी॰
साधना मे आप ज्यो भी मालाये इस्तेमाल करेगे वह माला साधना समाप्ती की पश्चात हनुमान मंदिर मे अर्पित कर दीजिये और अपनी सुख-सुविधा प्राप्ति की कामना कीजिये,और नैवेद्य चढाएगे वह स्वयं ही ग्रहन करनी है॰



जय निखिलेश्वर.....................................................................

Wednesday, 24 October 2012

तान्त्रोक्त गोरखक्षनाथ प्रत्यक्षीकरण साधना॰


श्रीमदभागवत महापुराण मे नवनाथ जी की वर्णन मिलती है,ऋषभदेवजी के १०० पुत्र थे और १०० मे से ९ पुत्र ज्ञानमार्गी सन्यासी बन गये॰ इसी पुराण मे एकादश स्कन्ध मे इस बात की वर्णन बताई हुयी है॰
निमिराजा जी को ऋषियोने धर्म तत्व समजाई थी,वही ऋषि फिर से कलयुग मे जन्मे और उन्होने नाथसप्रदाय की स्थापना की और दुनिया की कल्याण की लिये ‘’योगसिद्धि’’ और भक्ति मार्ग समजाइ॰
कली ने ‘मच्छीन्द्र’, हरी ने ‘गोरक्ष’, अंतरिश ने ‘जालिन्दर’, प्रबुद्ध ने ‘कानिफ’, पिप्पलायन ने ‘चर्पटी’, अर्वीहोत्रा ने ‘वटसिद्ध नागनाथ’, द्रुमील ने ‘भर्तरी’,चमस ने ‘रेवण’ और करभजन ने ‘गहिनी’ इस प्रकार से इन्होंने जन्म ली है॰
आदिनाथ शिवजी और दत्तात्रेय जी की आज्ञा से,दीक्षा से नाथसप्रदाय की जन्म हुयी है॰
                                       

                                                           नाथपंथिय दीक्षा विधि


         नाथसप्रदाय मे दीक्षा ग्रहण करने की लिये पौष,माघ,फाल्गुन व चैत्र माह और पूर्णिमा शुभ मानी जाती है॰दीक्षा से पूर्व गुरु अपने शिष्य की अनेक प्रकार से परीक्षा तो लेते ही है॰ दीक्षा की समय सिहनाद सुनाई जाती है और ‘अलख निरंजन’ शब्द की महत्व समजाइ जाती है॰ दीक्षा की पद्धतीनुसार ‘दर्शनीनाथ व अवघडनाथ’ येसी दो प्रकार की सप्रदाय है॰ जीनके कान मे कुंडल होती है वह दर्शनीनाथ के नाम से जाने जाती है। साधना की माध्यम से भी आप नवनाथ सप्रदाय की अवघड दीक्षा की प्राप्ति कर सकते है॰
अब येसी विधि हमारे पास हो और हम दीक्षा प्राप्ति ना कर सके यह बात तो उचित ही नहीं है,इसीलिये आप भी अवघड दीक्षा की प्राप्ति कर सकते है ॰ अब यह दीक्षा आप प्राप्त करके साबर मंत्रो मे सफलता और पूर्ण गोरक्ष कृपा भी प्राप्त कीजिये॰

साधना सामग्री- 
             
           काले कंबल की आसन,रुद्राक्ष माला,चैतन्य नवनाथ चित्र,

विधि-

            उत्तर या पूर्व दिशा की और मुख करके बैठीये,सामने किसी बाजोट पर पीली वस्त्र बिछानी है और इसपे चैतन्य सदगुरुजी एवं नवनाथ जी की चित्र की स्थापना कीजिये॰साथ मे कलश स्थापना भी करनी है,कलश स्थापना की विधि जैसी भी आपके पास हो उसी प्रकार से कीजिये॰ दीपक पूजन करके दीप प्रज्वलित करनी है और सुगंधित धूप बत्ती जलानी है॰ गुरुपूजन कीजिये और साथ मे गुरुमंत्र की ९ माला और ॐ नम: शिवाय मंत्र की १ माला करनी है ॰ सदगुरुजी से साधना सफलता की और दीक्षा प्राप्ति की लिये प्रार्थना कीजिये॰ ‘’श्रीनाथ जी की जय’’ बोलते हुये ताली बजानी है॰अब नवानाथ जी को प्रणाम करते हुये ९ बार नाथ मंत्र बोलनी है साथ मे ही अपनी मनोकामना बोलनी है की ‘’मै अमुक गुरुजी का शिष्य/शिष्या अवघडनाथ दीक्षा प्राप्ति एवं दर्शन की अभिलाषा हेतु आपसे प्रार्थना करता/करती हु,कृपया आप इस मनोकामना को पूर्ण कर दीजिये’’,और पुष्प माला चढ़ा दीजिये यह क्रिया ७ दिन नित्य करनी है॰




 गोरक्ष जालंदर चर्पटाच्श्र अड़बंग कानिफ मच्छीद्राद्या:। चौरंगीरेवणकभात्रीसंज्ञा भूम्यां बभूवर्ननाथसिद्धा:। । 



अब हमे २२/११/२०१२ से साधना २८/११/२०१२ तक नीत्य २१ माला मंत्र जाप करते हुये प्रारम्भ करनी है॰ समय ब्रम्हमुहूर्त की होनी चाहिये.............. 

 

तान्त्रोक्त गोरखक्षनाथ प्रत्यक्षीकरण मंत्र-

                                   

 

                                   । । ॐ ह्रीं श्रीं गों हुं फट स्वाहा । ।                                     

                       । । Om hreem shreem gom hum phat swaha । । 

 

 


 साधना समाप्ती मे आखरी दिवस पर गोरखनाथ जी की दर्शन होती है और साथ मे ही उनसे सूष्म-पात,शक्तिपात या मंत्र दीक्षा की माध्यम से दीक्षा की प्राप्ति होती है॰ येसा अगर साधक के साथ संभव नहीं हुआ तो चिंता की कोई बात नहीं यह क्रिया उसके साथ स्वप्न की माध्यम से हो ही जाती है॰ माला को आप सदैव संभाल कर रखिये यह माला आपको साबर साधना ओ मे शीघ्र सफलता प्रदान करती है यह इस साधना की विशेषता है॰ 


अलख निरंजन,अलख निरंजन,अलख निरंजन,अलख निरंजन,अलख निरंजन...........






जय जय निखिलेश्वर...................................................


Sunday, 14 October 2012

कामकाली साधना



सारी ब्रम्हान्ड मे ज्यो कुछ देखे वह माँ आपकी ही माया है ।
पही हो माँ ज्यो मेरी हो और सिर्फ मेरी ही माँ हो । ।

कामकाली जी की स्तुति नहीं कर सकती हु क्यूकी माँ की गुणगान की लिए शब्द ही छोटे पड रहे है,फिर भी एक बार कोशिश करके देखती हु...................
जिस समय दिन-रात,पृथ्वी-आकाश,हवा-पानी,विवेक-बुद्धि,हृदय की स्पंदने कुछ भी न था उस समय आदिशक्ति पराम्बा जी की रूप मे सिर्फ आप और सिर्फ आप ही थी। आप ने मेरी प्यारी माँ ब्रम्हा,विष्णु,महेश,और इस त्रिभुवन को भी जन्म दिया है। हे माँ आप चौदह भुवनो की अधिष्ट्राती देवी हो,सभी देवी देवताये आपकी साधना करके ही सिद्ध और चैतन्य बने हुये है और आपकी ही कृपा से सभी देवी-देवताओको सिद्धीया प्राप्त हुयी है।
‘’कामकला मे काम बीज क्लीं है,क्लींकार सदाशिव काम है, आकाश तत्व है, पृथ्वी तत्व है, पाताल से लेकर आकाश तक सारी आपकी ही कला है। जब तक माँ आपकी शक्ति सभी देवी देवताओ के साथ कार्य कर रही है तब तक ही इन सबकी वास्तविकता है, इसी कारण रात्री की मध्यकाल मे।महानिशा की शुभ समय मे आपकी उपासना सर्वश्रेष्ठ है,
नवरात्रि नजदीक आ रही है इसीलिये मै ज्यादा कुछ नहीं लिख पाउगी परंतु नवरात्रि की बाद और कुछ लिखना चाहुगी।

साधना विधि :-

सर्वप्रथम गुरुपूजन कीजिये और गुरुमंत्र की 5 माला जाप कीजिये। फिर भैरव मंत्र की 1 माला जाप करनी है ।

यह मंत्र माँ की सेवा मे ज्यो भैरव जी है,उनकी है।

                      ॥ फ्रें भैरवाय फ्रें फट ॥


विनियोग:-

        ॐ अस्य श्री वितहव्य ऋषी जगती छन्द कामकालीदेवता नाराच द्रां बीजं कुन्त क्रीं शक्ति सृष्टि किलकं श्रीकामकालीका सिद्धि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:।

ध्यान:-

ध्यानमस्या: प्रवक्ष्यामी कुरू चीत्तयेकतानाम ।
उद्ददघनाघना श्लीष्यज्जवाकुसुमसन्नीभाम । ।

करन्यास:-

क्लीं का अंगुष्टाभ्यां नम:।
क्रीं म तर्जनिभ्यां नम:।
हुं क मध्यमाभ्यां नम:।
क्रों ला अनामिकाभ्यां नम:।
स्फ्रें का कनीष्ठीकाभ्यां नम:।
काम कलाकाली ली करतल करपृष्ठाभ्यां नम:।

मंत्र :-

             । ।  क्लीं स्फ्रें स्फ्रें क्लीं फट । ।



साधना मे आप काले वस्त्र ,काला आसन ,काली हकीक या रुद्राक्ष की माला,महाकाली जी का चित्र एवं कोई भी शिवलिंग । दिशा पूर्व या दक्षिण । समय 11:36 से 01:36 तक।संकल्प लेना आवश्यक है। इस साधना मे 11 मालाये नीत्य 9 दिन तक करनी है .

साधना समाप्ती की बाद रोज शिव जी का अभिषेक 108 मंत्र बोलते हुये कीजिये

                    ॥ क्लीं शिवाय क्लीं फट ॥


अब प्रसाद की स्वरूप मे भोग लगा दीजिये। और कोई एक सफ़ेद पुष्प चढाते हुये फिर से एक बार अपनी मनोकामना बोल दीजिये।
                 ॐ शांति शांति बोलते हुये अब अपनी ऊपर जल छिडके।

यह पूर्ण क्रिया 9 दिन तक करनी है तभी जाकर साधना पूर्ण मनी जायेगी,और आपकी इच्छाये भी पूर्ण हो जायेगी.........


जय निखिलेश्वर.................

Saturday, 13 October 2012

द्वादश काली साधन


यह सारी की सारी ब्रम्हान्ड मात्र एक अपार सक्रिय चेतना की प्रवाह है अर्थात इस अपार शक्ति की द्वादश काली की प्रतिक रूप मे तीस अंशो मे तथा इन्ही तीस अंशो को माह की रूप मे दर्शायी गयी है. इन्ही तीस अंशो की प्रथम प्रतिप्रदा से लेकर पूर्णमासी एवं फिर पूर्णमासी के बाद प्रतिप्रदा से अमावस्या तक तिथियो की फलस्वरूप तीस अंश की प्रत्येक अंश मे विभक्त की कियी गयी है। इस प्रकार हमारी पृथ्वी की यही तीस अंश मास की फलस्वरूप अंश रेखा कहलाती है। यही द्वादश काली प्रथम सृष्टि + स्थिति एवं संहार करती रहेती है।
अर्थात
प्रथम स्थिति मे  (स्थिति+सृष्टि) ,(सृष्टि+स्थिति) एवं (सृष्टि+संहार)…………….
द्वितीय स्थिति मे (सृष्टि+सृष्टि) ,(स्थिति+स्थिति) एवं (स्थिति+संहार)…………
तृतीय स्थिति मे  (संहार+संहार) ,(संहार+सृष्टि) एवं (संहार+स्थिती) की रूप मे कालचक्र का बनाना एवं बिगड़ना यह क्रिया निरंतर चलती रहेती ही है। इस प्रकार से ब्रम्हान्ड व्यापक शक्ति की स्वयंभू स्वरूप है और इसी स्वरूप की चारों ओर आठ भैरव रूपी शक्तीयो की निवास है।
भैरव अर्थात () से भरण(सृष्टि) ,() से रमण(स्थिति) तथा () से वरण(संहार)। यही अष्ट भैरव अष्ट दिशाओ को भी दर्शाते है। इन्हि की बीच मे पूर्ण राज भैरव है,क्योकि इसी पूर्ण राज भैरव अर्थात सूर्य की पृथ्वी (माता) भी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की परिक्रमा करती रहेती है। यहा पूर्ण राज भैरवजी पर मै ज्यादा नहीं लिखना चाहती हु ,परंतु समय आने पर इनकी साधना अवश्य दुगी।
साधना:- यह बात तो आपको समज़ मे आ ही गयी होगी की द्वादश काली साधना कितनी महत्वपूर्ण साधना है । इस साधना से बहोत सारी लाभों की मान्यताये कई तंत्र शास्त्र मे बताई गयी है।
ज्यो साधक/साधिका अपनी पूर्ण जीवन काल मे द्वादश काली साधना सम्पन्न करते है वह साधक ब्रम्हान्ड भेदन क्रिया के अधिकारी होते है और सारे दृष्ट ग्रह उनके सामने हाथ बांधे हुये खड़े होते ही है..................
सामग्री:- महाकाली चित्र,काली हकीक माला,एक सुपारी,काली धोती,काला आसन,एक हरे रंग की नींबू ।


विनियोग :-

    ॐ अस्य श्री द्वादश काली मंत्रस्य भैरव ऋषी:,उष्णीक छंन्द:,कालिका देवता , क्रीं बीजम ,हुं शक्ती: ,क्रीं किलकं मम अभीष्ट सिध्द्यर्थे जपे विनियोग:।

देवी की स्तुति कीजिये परंतु अपनी भावना की आधार पर,ज्यो भी आपकी दिल से निकले वह स्तुति एवं ध्यान कीजिये ।

अब भगवान महाकालभैरव जी को कोई एक पुष्प मंत्र बोलते हुये समर्पित कीजिये।

ॐ हूं स्फ़्रौं यं रं लं वं क्रौं महकालभैरव सर्व विघ्नन्नाशय नाशाय ह्रीं श्रीं फट् स्वाहा   



अब निम्न मंत्र की 18 मालाये नवरात्रि की प्रतिप्रदा से अष्टमी तक करनी है और नवमी को किसी अग्नि पात्र मे अग्नि प्रज्वलित कीजिये साथ मे काले तिल और काली मिर्च की 151 आहुती दीजिये।यह विधान सम्पन्न करते ही आपकी साधना पूर्ण मनी जायेगी।
                       मंत्र :

      । । ॐ क्रीं हुं क्रीं द्वादश कालीके क्रीं हुं क्रीं फट् । ।



निम्न मंत्र बोलते हुये देवी को प्रणाम कीजिये और कोई भी लाल रंग की पुष्प समर्पित कीजिये।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्रीं हुं ह्रीं श्री सर्वार्थदायक ब्रम्हान्ड स्वामिनी नमस्ते नमस्ते स्वाहा  

अब देवी को नींबू की बली चढानी है,इसीलिए निम्न मंत्र बोलते हुये ज़ोर से नींबू पे प्रहार कीजिये और देवी की सामने उसे फोड़ दीजिये।

क्रीं ह्रीं क्रीं फट बलीं दद्यात स्वाहा


साधना काल मे शुद्धता की पालन कीजिये,और नवरात्रि की पावन पर्व इस साधना की लिये यह तीव्रतम समय है क्यूकी यह नवरात्रि मंगलवार से प्रारम्भ हो रही है। और यह साधना समाप्त होते ही रात्री मे माँ स्वप्न मे दर्शन देती है और हमसे कोई भी इच्छा प्रग करने की आज्ञा देती है,हम माँ से ज्यो भी वरदान मांगेंगे वह माँ तथास्तु कहेते हुये प्रदान कर देती ही है।अब जब माँ ही सब कुछ देने की लिये तयार है तो मै साधना की बारे मे और क्या लाभ लिख सकती हु ।


जय निखिलेश्वर...................................